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उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी की ‘अवध संध्या’ का कार्यक्रम देश और वचन के लिए पुत्र प्रेम त्यागने वाली मार्मिक प्रस्तुति ‘माँ’ मुंशी प्रेमचंद जी की प्रसिद्ध कहानी उतरी मंच पर

उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी की ‘अवध संध्या’ का कार्यक्रम
देश और वचन के लिए पुत्र प्रेम त्यागने वाली मार्मिक प्रस्तुति ‘माँ’
मुंशी प्रेमचंद जी की प्रसिद्ध कहानी उतरी मंच पर

लखनऊ, 26 फरवरी। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की मासिक शृंखला ‘अवध सन्ध्या’ के अंतर्गत आज शाम मुंशी प्रेमचंद जी की प्रसिद्ध कहानी ‘माँ’ का मंचन सृजन शक्ति वेलफेयर सोसाइटी की ओर से के.के.अग्रवाल की लेखन परिकल्पना व निर्देशन में किया गया। सन्त गाडगेजी महाराज प्रेक्षागृह गोमतीनगर में नारी की वचनबद्धता और उसके त्याग व बलिदान को दर्शाने वाली इस मार्मिक प्रस्तुति के अवसर पर मुख्यअतिथि के तौर पर मुख्य सचिव आर.के.तिवारी-अर्चना तिवारी व अतिथियों के रूप में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी योगेशकुमार, ब्रिगेडियर रवीन्द्र श्रीवास्तव, एडीजी रेणुका मिश्रा व पूर्व डीजीपी महेन्द्र मोदी उपस्थित थे।
अतिथियों के साथ इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन करते हुए अकादमी के सचिव तरुण राज ने अकादमी की गतिविधियों से परिचित कराते हुए प्रदेश सरकार के मिशन शक्ति कंे अंतर्गत प्रस्तुत कार्यक्रमों का ज़िक्र किया।
देश के प्रति निष्ठा रखने वाले स्वतंत्रता सेनानी पति को दिये गये वचन को निभाने के लिए पुत्र प्रेम के बलिदान कर देेने वाली भारतीय नारी को दिखाने वाले इस नाटक की कहानी के अनुसार करुणा सात वर्षों की सजा काटकर अंग्रेजों की जेल से लौट रहे, अपने स्वतंत्रता सेनानी पति आदित्य की प्रतीक्षा करती इस उसकी कल्पना में है कि इन्कलाब जिंदाबाद के नारों के बीच, भीड़ से घिरे आदित्य को पुलिस ससम्मान घर लेकर आएगी। किंतु शाम होते-होते जेल में यातनाओं से टूटा और तपेदिक से ग्रसित आदित्य अकेला घर पहुंचता है। घर पहुंच कर आदित्य अपने पुत्र प्रकाश को भी एक वीर स्वतंत्रता सैनानी बनाने का वचन लेकर करुणा की बांहों में संसार त्याग देता है।
बड़ा होकर प्रकाश यूं तो एक कुशाग्र एवं मां से स्नेह करने वाला पुत्र है किंतु देश सेवा एवं सामाजिक कार्यों में उसकी कोई रुचि नहीं होती। यहां तक कि वो मां की इच्छाओं के विरुद्ध, अंग्रेजी सरकार के वजीफे पर, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विलायत भी चला जाता है। पुत्र की इस अवहेलना और जीवन के संघर्षों से व्यथित करुणा धीरे-धीरे टूटती चली जाती है। प्रकाश को पति की आशाओं व वचन के अनुरूप न ढाल सकने से आहत करुणा, अपने को आदित्य का दोषी मान प्रकाश से अपने सारे संबंध तोड़ लेती है। यहां तक कि उसके द्वारा भेजे पत्रों को भी बिना पढ़े फाड़कर फेंक देती है। किन्तु पुत्र प्रेम से विचलित करुणा एक रात प्रकाश के फाड़े हुए पत्र को जोड़ने का प्रयास करते-करते सो जाती है। स्वप्न में वह उसको मजिस्ट्रेट के रुप में अंग्रेजी सरकार से विद्रोह के आरोप में अपने पिता को मृत्युदंड सुनाते हुये देखती है। इस भयानक स्वप्न से आहत करुंणा चीखकर उठ बैठती है और रात भर में जोड़े हुए पत्र को पुनः फाड़कर अपने पुत्र को मृत्यु दण्ड सुनाती है।
नाटक में मंच पर मां की मुख्य भूमिका में डा.सीमा मोदी ने भावपूर्ण मार्मिक अभिनय किया। आदित्य की भूमिका कलाकार नवनीत मिश्रा, बेटे प्रकाश की भूमिका में आरुष उपाध्याय और जितेंद्र कुमार मंच पर उतरे। सेवक-आदित्य, भिखारी-सुनील कुमार, पुलिसवाले- सूरज गौतम व सर्वेश कुमार के संग क्रांतिकारियों की भूमिका शिवम मिश्रा, अभिषेक दूबे व मोनिस सिद्दीकी ने निभाई। मंच पाश्र्व के पक्ष में प्रकाश परिकल्पना मोहम्मद हफीज, संगीत संचालन हर्ष पुरवार, वेशभूषा निर्मला वर्णवाल, दृश्यबंध शैलेन्द्र विश्वकर्मा का रहा। अन्य पक्षों में पूर्वाभ्यास प्रभारी नवनीत मिश्रा व अम्बरीष चतुर्वेदी, प्रस्तुति नियंत्रक सौम्या मोदी, रूपसज्जा बिमला वर्णवाल का योगदान रहा। प्रस्तुतकर्ता द्वय में शुभम आदित्य के साथ शामिल अभिनेत्री डा.सीमा ने सह निर्देशन का दायित्व भी निभाया।

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